वो सुबह मुझे आज भी याद है, जब मैंने गीले बालों में उंगलियां फेरीं और हाथ में बालों का एक पूरा गुच्छा आ गया। आईने में अपनी मांग को चौड़ा होते देखकर मेरा दिल बैठ गया, जैसे मैं खुद को ही खो रही हूँ।
घर में सब कुछ नया था, नन्हा सा बच्चा, नींद की कमी और वो थकान जो हड्डियों तक उतर गई थी। लेकिन उस आईने के सामने खड़े होकर मुझे डर लगने लगा। वो डर सिर्फ बालों के गिरने का नहीं था, वो डर इस बात का था कि क्या मैं कभी पहले जैसी दिख पाऊंगी?
मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप उन बालों को डस्टबिन में डाल दिया ताकि किसी को पता न चले। वो नीली कंघी, जो नानी ने दी थी, अब मेरे लिए किसी दुश्मन जैसी हो गई थी। हर बार जब मैं उसे उठाती, तो हाथ कांपने लगते थे।
मैंने सब कुछ try किया — बाज़ार में मिलने वाले वो महंगे शैम्पू जिनके विज्ञापन हर जगह दिखते हैं, केमिस्ट की सलाह पर ली गई वो विटामिन की गोलियां, और न जाने कितने महंगे हेयर मास्क। मैंने अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा इन पर खर्च कर दिया, लेकिन नतीजा वही रहा। ड्रेन में फंसी बालों की गुच्छियां कम होने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
वो केमिकल वाले शैम्पू मेरी स्कैल्प को और भी रूखा बना रहे थे। मुझे लगा कि शायद मैं कुछ गलत कर रही हूँ, या शायद ये मेरी किस्मत ही है। मैंने सोचा था कि ये तो बस एक दौर है, जो बीत जाएगा, लेकिन हफ्तों बीतने के बाद भी कुछ नहीं बदला।
हर बार जब मैंने कोई नया प्रोडक्ट खरीदा, तो उम्मीद थी कि इस बार शायद कुछ हो जाए। लेकिन हर बार, कंघी में वही डरावनी संख्या देखकर निराशा और गहरी हो जाती थी। मैंने अपनी मेहनत की कमाई उन प्रोडक्ट्स पर लुटा दी, जो सिर्फ ऊपर से चमक देने का वादा करते थे, लेकिन जड़ों पर असर कुछ नहीं था।